योगी आदित्यनाथ का जादू विधानसभा चुनावों में क्यों नहीं चल पाया?
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, हार-जीत के अलग-अलग कोणों से विश्लेषण हो रहे हैं, आगे के चुनाव में उनके प्रभाव के भी अनुमान लगाए जा रहे हैं, ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक बार फिर चर्चा में हैं.
योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते बीजेपी के लिए प्रचार करने हर जगह जाएं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं.
लेकिन उम्मीदवारों की मांग और योगी के भाषणों में उनकी ऊर्जा को देखते हुए चुनावों में उनकी छवि बीजेपी के एक बड़े ब्रैंड के तौर पर उभरी.
चर्चाएं तो यहां तक होने लगीं कि 'अब वो मोदी का विकल्प' बन चुके हैं.
लेकिन चुनाव नतीजों के बाद ऐसी तमाम धारणाओं पर ठीक उसी तरह पानी फिर गया, जैसे साल 2014 के बाद नरेंद्र मोदी की अपराजेय छवि और अमित शाह की चुनावी मैनेजर की छवि के साथ हुआ.
उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच विषम परिस्थितियों में भी योगी आदित्यनाथ ने इन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए जमकर समय निकाला.
योगी ने की 70 से ज़्यादा रैलियां
इन सभी राज्यों में उन्होंने 70 से ज़्यादा रैलियां कीं, भाषण शैली में वही जोश, वही तल्ख़ी दिखाई जिसके लिए वो जाने जाते हैं, मीडिया में चर्चा में भी इसीलिए ख़ूब आए, लेकिन ये सारी बातें शायद मतदाताओं को अच्छी नहीं लगीं.
70 से ज़्यादा रैलियों और सभाओं के बावजूद तीनों राज्य बीजेपी के हाथ से निकल गए.
वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "तेलंगाना में तो नुकसान ही हुआ लेकिन राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में उनका कोई प्रभाव पड़ता, ऐसी उम्मीद भी नहीं थी. इन तीनों राज्यों में मुस्लिम आबादी उतनी ज़्यादा नहीं है, इसलिए ध्रुवीकरण करना थोड़ा मुश्किल है और उसका कोई बहुत फ़ायदा भी नहीं है."
वो कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ ने हालांकि इसकी पूरी कोशिश की कि हिंदू वोट प्रभावित हों, लेकिन उससे कोई फ़र्क पड़ा नहीं. यदि पड़ा होता तो परिणाम में ज़रूर दिखता."
मिज़ोरम को छोड़कर अन्य चार राज्यों में योगी ने जमकर चुनाव प्रचार किया. उन्होंने सबसे ज़्यादा 26 चुनावी सभाएं राजस्थान में कीं जबकि छत्तीसगढ़ में 23 और मध्य प्रदेश में उन्होंने 17 सभाएं कीं. तेलंगाना में भी योगी आदित्यनाथ ने आठ जनसभाओं को संबोधित किया.
योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते बीजेपी के लिए प्रचार करने हर जगह जाएं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं.
लेकिन उम्मीदवारों की मांग और योगी के भाषणों में उनकी ऊर्जा को देखते हुए चुनावों में उनकी छवि बीजेपी के एक बड़े ब्रैंड के तौर पर उभरी.
चर्चाएं तो यहां तक होने लगीं कि 'अब वो मोदी का विकल्प' बन चुके हैं.
लेकिन चुनाव नतीजों के बाद ऐसी तमाम धारणाओं पर ठीक उसी तरह पानी फिर गया, जैसे साल 2014 के बाद नरेंद्र मोदी की अपराजेय छवि और अमित शाह की चुनावी मैनेजर की छवि के साथ हुआ.
उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच विषम परिस्थितियों में भी योगी आदित्यनाथ ने इन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए जमकर समय निकाला.
योगी ने की 70 से ज़्यादा रैलियां
इन सभी राज्यों में उन्होंने 70 से ज़्यादा रैलियां कीं, भाषण शैली में वही जोश, वही तल्ख़ी दिखाई जिसके लिए वो जाने जाते हैं, मीडिया में चर्चा में भी इसीलिए ख़ूब आए, लेकिन ये सारी बातें शायद मतदाताओं को अच्छी नहीं लगीं.
70 से ज़्यादा रैलियों और सभाओं के बावजूद तीनों राज्य बीजेपी के हाथ से निकल गए.
वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "तेलंगाना में तो नुकसान ही हुआ लेकिन राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में उनका कोई प्रभाव पड़ता, ऐसी उम्मीद भी नहीं थी. इन तीनों राज्यों में मुस्लिम आबादी उतनी ज़्यादा नहीं है, इसलिए ध्रुवीकरण करना थोड़ा मुश्किल है और उसका कोई बहुत फ़ायदा भी नहीं है."
वो कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ ने हालांकि इसकी पूरी कोशिश की कि हिंदू वोट प्रभावित हों, लेकिन उससे कोई फ़र्क पड़ा नहीं. यदि पड़ा होता तो परिणाम में ज़रूर दिखता."
मिज़ोरम को छोड़कर अन्य चार राज्यों में योगी ने जमकर चुनाव प्रचार किया. उन्होंने सबसे ज़्यादा 26 चुनावी सभाएं राजस्थान में कीं जबकि छत्तीसगढ़ में 23 और मध्य प्रदेश में उन्होंने 17 सभाएं कीं. तेलंगाना में भी योगी आदित्यनाथ ने आठ जनसभाओं को संबोधित किया.
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