ऑस्ट्रेलिया में एशियाई मूल के छात्रों के साथ क्यों होता है यौन शोषण?
रिया सिंह (बदला हुआ नाम) रोज़ाना की तरह सिडनी सेंट्रल स्टेशन से अपनी यूनिवर्सिटी जा रहीं थीं. जैसे ही वो पहले से भरी हुई यूनिवर्सिटी बस में चढ़ीं एक पुरुष कर्मचारी ने उन्हें धक्का देना और सहलाना शुरू कर दिया.
"बीस मिनट की यात्रा के दौरान ये सब चलता रहा. मुझे बहुत बुरा लगा लेकिन मैं डरी हुई थी. मुझे पता नहीं था कि क्या करूं, किसके पास जाऊं. मैंने इस बारे में किसी को नहीं बताया क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे अभिभावकों को कुछ पता चले, वो शायद समझते भी नहीं."
"ये ऐसी बात भी नहीं थी कि मैं अपने छोटे भाई से साझा कर सकूं. मैंने अपनी सबसे क़रीबी दोस्त से इस बारे में बात की, वो भी नहीं समझ पाई कि क्या किया जाए."
2017 में ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सटी में यौन हमलों और यौन उत्पीड़न पर ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयोग ने एक राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इस रिपोर्ट का नाम था- चेंज द कोर्स. ये घटना इस रिपोर्ट के आने से कुछ दिन पहले की ही है.
बचपन में ही अपने परिवार के साथ ऑस्ट्रेलिया आईं रिया कहती हैं, "मैं ख़ामोश रही और मुझे इस बारे में कुछ न करने के लिए अपने आप पर ग़ुस्सा आ रहा था. दक्षिण एशियाई देशों से आए अधिकतर छात्र सोचते हैं कि यौन उत्पीड़न ऐसा विषय नहीं है जिस पर बात की जाए क्योंकि इससे उनके परिवार के सम्मान को ठेस पहुंच सकती है. रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से ऐसी घटनाओं को रोकने और उनसे निबटने के बारे में अधिक जागरुकता आई है."
एएचआरसी ने अपनी रिपोर्ट में पाया था कि 2015 और 2016 में यौन उत्पीड़न का शिकारअधिकतर छात्राओं के साथ सार्वजनिक यातायात सेवाओं में छेड़छाड़ की गई. यूनिवर्सिटी में यौन हमले का सामना करने वाली 51 प्रतिशत छात्राओं का कहना था कि वो हमलावर को जानती हैं.
मलेशिया से आई अंतरराष्ट्रीय छात्रा एमिली ली (बदला हुआ नाम) बताती हैं, "दोस्ताना दबाव में मैंने अपने मित्र के घर जाने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया. हमने कुछ शराब पी और उसके बाद उसने सेक्स करने की कोशिश की."
"मैं समझ नहीं पाई की इस स्थिति से कैसे निबटूं. मेरे लिए ये एक सांस्कृतिक झटका था. अपने देश में हमें यौन शिक्षा नहीं दी जाती है और अपने सामाजिक जीवन में मैंने शराब भी नहीं पी थी."
"मैं इस घटना को लेकर बहुत शर्मिंदा रही और कई सालों तक इस बारे में किसी को नहीं बताया क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे साथ किसी पीड़ित की तरह व्यवहार किया जाए और मुझे ही इस सबके लिए ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाए."
हाल ही में एमिली ने अपनी एक दोस्त को बताया कि उस रात जो हुआ वो बलात्कार था क्योंकि उसकी सहमति नहीं थी. एमिली कहती हैं, "अगर मुझमें सहमति के बारे में जागरूकता होती और जिस स्थिति में मुझे धकेला गया उसमें मैं ना कह देती तो मैं बलात्कार से बच सकती थी."
ऑस्ट्रेलिया की अंतरराष्ट्रीय छात्र परिषद की राष्ट्रिय महिला अधिकारी बेले लिम कहती हैं, "सेक्स को लेकर उदारवादी ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में आने वाले छात्रों को सेक्स और सहमति के बारे में शिक्षित और सशक्त करना हमारी ज़िम्मेदारी है. एशियाई देशों से आए छात्रों में सेक्स शिक्षा को लेकर जागरुकता नहीं होती और यही वजह है कि वो यौन शोषण या हमलों के अधिक शिकार होते हैं और इस तरह की घटनाओं को समझ नहीं पाते या इनसे सही से निबट नहीं पाते."
ऑस्ट्रेलिया आने वाले कई छात्र ऐसे होते हैं जो अपने घर के सुरक्षित माहौल से पहली बार बाहर निकलते हैं. एक नई संस्कृति से वो अनभिज्ञ होते हैं और इससे उनके लिए ख़तरा और बढ़ जाता है.
श्रीलंका से आईं एक पूर्व छात्रा देवाना सेनानायके कहती हैं, "जब मैंने मेलबर्न यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया तो मैं 18 साल की थी. मैंने शराब पीने, ड्रग्स लेने और मर्ज़ी के बिना छूने की संस्कृति को पहली बार देखा."
"मैं इससे बहुत असहज हो गई थी. मेरा सामना कैंपस में चार लड़कों से हो गया जो मेरे पीछे आए. मैं जिस तरह से पली बढ़ी थी ये उस संस्कृति के लिए नया था. मैं भाग्यशाली थी कि कुछ दोस्तों का समूह मुझे मिल गया, लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय छात्र होना कई बार एक नए देश में बहुत अकेला कर देता है."
39 यूनीवर्सिटी के 30 हज़ार से अधिक छात्रों पर हुए एचआरसी के एक सर्वे के मुताबिक़ 5.1 फ़ीसदी अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने साल 2015-2016 में अपने साथ यौन शोषण होने की बात कही है. सर्वे में शामिल 1.4 फ़ीसदी छात्रों का कहना है कि यूनिवर्सिटी में ही उनका शोषण हुआ. ये यौन व्यवहार पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं के साथ अधिक किया गया.
एएचआरसी की सेक्स डिसक्रिमिनिशेन कमिश्नर केट जेनकिंस कहती हैं, "हमारे सामने ऐसे सबूत आए जिनसे संकेत मिलते हैं कि अंतरराष्ट्रीय छात्र यौन हमलों और उत्पीड़न के मामलों के अधिक शिकार थे, उदाहरण के तौर पर, वो सहायता नेटवर्क की पहुंच से अधिक दूर हो सकते हैं, स्थानीय छात्रों के मुक़ाबले उन्हें ये कम पता हो कि मदद कैसे ली जाए. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और हमलों के बारे में मेरी ताज़ा जांच से हमें पता चला है कि कार्यस्थल पर भी वो ऐसे मामलों की अधिक शिकार हो सकती हैं."
छात्र संगठन, अधिकार समूह और यौन उत्पीड़न हमले के पीड़ित अब यूनिवर्सीट को अधिक ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए, और अधिक क़दम उठाने और पीड़ितों को सांस्कृतिक रूप से सही तरीक़े से मदद देने के लिए दबाव बना रहे हैं.
दक्षिण एशियाई समुदायों में ऐसे मुद्दों पर अधिक बात नहीं होती है और व्यवस्था भी इसे आसान नहीं बनाती है. सिडनी यूनिवर्सिटी पीजी रिप्रिसेंटेटिव एसोसिएशन की पूर्व सह-अध्यक्ष और पाकिस्तान से आईं छात्रा मरियम मोहम्मद बताती हैं कि एक पीड़िता ने उन्हें बताया कि जब काउंसलर ने उनसे यौन हमले के बारे में बात की तो उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो उनके सामने नंगी हो रही है.
रेप ऑन कैंपस ऑस्ट्रेलिया (ईआरओसी) के पास साल 2018 में मदद के लिए क़रीब सौ मामले आए जिनमें से पांच फ़ीसदी दक्षिण एशियाई छात्र थे. ईआरओसी की संस्थापक और निदेशक शर्ना ब्रेमनर कहती हैं, "ये एक बड़ी संख्या है क्योंकि दक्षिण एशिया के छात्र घटनाओं को कम ही रिपोर्ट करते हैं. जो जानकारी यूनिवर्सिटी छात्रों को दे रही है वो सांस्कृतिक रूप से अनुकूल नहीं है. कई बार तो छात्रों को ये ही नहीं पता होता कि वो इस तरह के व्यवहार के बारे में रिपोर्ट कर सकते हैं. कई छात्रों को लगता है कि रिपोर्ट दर्ज कराने का मतलब ये है कि उन्हें अपने घर पर भी घटना के बारे में बताना पड़ेगा और यही विचार उन्हें कुछ भी करने से रोक देता है."
सर्वे से पता चला है कि 87 प्रतिशत छात्र जिन पर यौन हमले हुए, और 94 प्रतिशत छात्र जिन का यौन उत्पीड़न हुआ उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी में कोई औपचारिक शिकायत नहीं दर्ज करवाई. अंतरराष्ट्रीय छात्रों के रिपोर्ट न दर्ज कराने की मुख्य वजह वीज़ा में दिक़्क़तें आने की आशंकाएं हैं.
ब्रेमनर कहती हैं, "जो छात्र रिपोर्ट दर्ज कराते हैं, उनमें से अधिकतर इसकी प्रतिक्रिया से ख़ुश नहीं हैं. कई बार यूनिवर्सिटी कोई क़दम ही नहीं उठाती तो कई बार सिर्फ़ सलाहकार उपलब्ध करवा देती हैं. लेकिन अभियुक्तों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है. ऐसे में वो इससे निबटने के लिए अकेले ही रह जाते हैं."
"बीस मिनट की यात्रा के दौरान ये सब चलता रहा. मुझे बहुत बुरा लगा लेकिन मैं डरी हुई थी. मुझे पता नहीं था कि क्या करूं, किसके पास जाऊं. मैंने इस बारे में किसी को नहीं बताया क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे अभिभावकों को कुछ पता चले, वो शायद समझते भी नहीं."
"ये ऐसी बात भी नहीं थी कि मैं अपने छोटे भाई से साझा कर सकूं. मैंने अपनी सबसे क़रीबी दोस्त से इस बारे में बात की, वो भी नहीं समझ पाई कि क्या किया जाए."
2017 में ऑस्ट्रेलियन यूनिवर्सटी में यौन हमलों और यौन उत्पीड़न पर ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयोग ने एक राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इस रिपोर्ट का नाम था- चेंज द कोर्स. ये घटना इस रिपोर्ट के आने से कुछ दिन पहले की ही है.
बचपन में ही अपने परिवार के साथ ऑस्ट्रेलिया आईं रिया कहती हैं, "मैं ख़ामोश रही और मुझे इस बारे में कुछ न करने के लिए अपने आप पर ग़ुस्सा आ रहा था. दक्षिण एशियाई देशों से आए अधिकतर छात्र सोचते हैं कि यौन उत्पीड़न ऐसा विषय नहीं है जिस पर बात की जाए क्योंकि इससे उनके परिवार के सम्मान को ठेस पहुंच सकती है. रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से ऐसी घटनाओं को रोकने और उनसे निबटने के बारे में अधिक जागरुकता आई है."
एएचआरसी ने अपनी रिपोर्ट में पाया था कि 2015 और 2016 में यौन उत्पीड़न का शिकारअधिकतर छात्राओं के साथ सार्वजनिक यातायात सेवाओं में छेड़छाड़ की गई. यूनिवर्सिटी में यौन हमले का सामना करने वाली 51 प्रतिशत छात्राओं का कहना था कि वो हमलावर को जानती हैं.
मलेशिया से आई अंतरराष्ट्रीय छात्रा एमिली ली (बदला हुआ नाम) बताती हैं, "दोस्ताना दबाव में मैंने अपने मित्र के घर जाने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया. हमने कुछ शराब पी और उसके बाद उसने सेक्स करने की कोशिश की."
"मैं समझ नहीं पाई की इस स्थिति से कैसे निबटूं. मेरे लिए ये एक सांस्कृतिक झटका था. अपने देश में हमें यौन शिक्षा नहीं दी जाती है और अपने सामाजिक जीवन में मैंने शराब भी नहीं पी थी."
"मैं इस घटना को लेकर बहुत शर्मिंदा रही और कई सालों तक इस बारे में किसी को नहीं बताया क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरे साथ किसी पीड़ित की तरह व्यवहार किया जाए और मुझे ही इस सबके लिए ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाए."
हाल ही में एमिली ने अपनी एक दोस्त को बताया कि उस रात जो हुआ वो बलात्कार था क्योंकि उसकी सहमति नहीं थी. एमिली कहती हैं, "अगर मुझमें सहमति के बारे में जागरूकता होती और जिस स्थिति में मुझे धकेला गया उसमें मैं ना कह देती तो मैं बलात्कार से बच सकती थी."
ऑस्ट्रेलिया की अंतरराष्ट्रीय छात्र परिषद की राष्ट्रिय महिला अधिकारी बेले लिम कहती हैं, "सेक्स को लेकर उदारवादी ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में आने वाले छात्रों को सेक्स और सहमति के बारे में शिक्षित और सशक्त करना हमारी ज़िम्मेदारी है. एशियाई देशों से आए छात्रों में सेक्स शिक्षा को लेकर जागरुकता नहीं होती और यही वजह है कि वो यौन शोषण या हमलों के अधिक शिकार होते हैं और इस तरह की घटनाओं को समझ नहीं पाते या इनसे सही से निबट नहीं पाते."
ऑस्ट्रेलिया आने वाले कई छात्र ऐसे होते हैं जो अपने घर के सुरक्षित माहौल से पहली बार बाहर निकलते हैं. एक नई संस्कृति से वो अनभिज्ञ होते हैं और इससे उनके लिए ख़तरा और बढ़ जाता है.
श्रीलंका से आईं एक पूर्व छात्रा देवाना सेनानायके कहती हैं, "जब मैंने मेलबर्न यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया तो मैं 18 साल की थी. मैंने शराब पीने, ड्रग्स लेने और मर्ज़ी के बिना छूने की संस्कृति को पहली बार देखा."
"मैं इससे बहुत असहज हो गई थी. मेरा सामना कैंपस में चार लड़कों से हो गया जो मेरे पीछे आए. मैं जिस तरह से पली बढ़ी थी ये उस संस्कृति के लिए नया था. मैं भाग्यशाली थी कि कुछ दोस्तों का समूह मुझे मिल गया, लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय छात्र होना कई बार एक नए देश में बहुत अकेला कर देता है."
39 यूनीवर्सिटी के 30 हज़ार से अधिक छात्रों पर हुए एचआरसी के एक सर्वे के मुताबिक़ 5.1 फ़ीसदी अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने साल 2015-2016 में अपने साथ यौन शोषण होने की बात कही है. सर्वे में शामिल 1.4 फ़ीसदी छात्रों का कहना है कि यूनिवर्सिटी में ही उनका शोषण हुआ. ये यौन व्यवहार पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं के साथ अधिक किया गया.
एएचआरसी की सेक्स डिसक्रिमिनिशेन कमिश्नर केट जेनकिंस कहती हैं, "हमारे सामने ऐसे सबूत आए जिनसे संकेत मिलते हैं कि अंतरराष्ट्रीय छात्र यौन हमलों और उत्पीड़न के मामलों के अधिक शिकार थे, उदाहरण के तौर पर, वो सहायता नेटवर्क की पहुंच से अधिक दूर हो सकते हैं, स्थानीय छात्रों के मुक़ाबले उन्हें ये कम पता हो कि मदद कैसे ली जाए. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और हमलों के बारे में मेरी ताज़ा जांच से हमें पता चला है कि कार्यस्थल पर भी वो ऐसे मामलों की अधिक शिकार हो सकती हैं."
छात्र संगठन, अधिकार समूह और यौन उत्पीड़न हमले के पीड़ित अब यूनिवर्सीट को अधिक ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए, और अधिक क़दम उठाने और पीड़ितों को सांस्कृतिक रूप से सही तरीक़े से मदद देने के लिए दबाव बना रहे हैं.
दक्षिण एशियाई समुदायों में ऐसे मुद्दों पर अधिक बात नहीं होती है और व्यवस्था भी इसे आसान नहीं बनाती है. सिडनी यूनिवर्सिटी पीजी रिप्रिसेंटेटिव एसोसिएशन की पूर्व सह-अध्यक्ष और पाकिस्तान से आईं छात्रा मरियम मोहम्मद बताती हैं कि एक पीड़िता ने उन्हें बताया कि जब काउंसलर ने उनसे यौन हमले के बारे में बात की तो उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो उनके सामने नंगी हो रही है.
रेप ऑन कैंपस ऑस्ट्रेलिया (ईआरओसी) के पास साल 2018 में मदद के लिए क़रीब सौ मामले आए जिनमें से पांच फ़ीसदी दक्षिण एशियाई छात्र थे. ईआरओसी की संस्थापक और निदेशक शर्ना ब्रेमनर कहती हैं, "ये एक बड़ी संख्या है क्योंकि दक्षिण एशिया के छात्र घटनाओं को कम ही रिपोर्ट करते हैं. जो जानकारी यूनिवर्सिटी छात्रों को दे रही है वो सांस्कृतिक रूप से अनुकूल नहीं है. कई बार तो छात्रों को ये ही नहीं पता होता कि वो इस तरह के व्यवहार के बारे में रिपोर्ट कर सकते हैं. कई छात्रों को लगता है कि रिपोर्ट दर्ज कराने का मतलब ये है कि उन्हें अपने घर पर भी घटना के बारे में बताना पड़ेगा और यही विचार उन्हें कुछ भी करने से रोक देता है."
सर्वे से पता चला है कि 87 प्रतिशत छात्र जिन पर यौन हमले हुए, और 94 प्रतिशत छात्र जिन का यौन उत्पीड़न हुआ उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी में कोई औपचारिक शिकायत नहीं दर्ज करवाई. अंतरराष्ट्रीय छात्रों के रिपोर्ट न दर्ज कराने की मुख्य वजह वीज़ा में दिक़्क़तें आने की आशंकाएं हैं.
ब्रेमनर कहती हैं, "जो छात्र रिपोर्ट दर्ज कराते हैं, उनमें से अधिकतर इसकी प्रतिक्रिया से ख़ुश नहीं हैं. कई बार यूनिवर्सिटी कोई क़दम ही नहीं उठाती तो कई बार सिर्फ़ सलाहकार उपलब्ध करवा देती हैं. लेकिन अभियुक्तों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है. ऐसे में वो इससे निबटने के लिए अकेले ही रह जाते हैं."
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